आज के वचन पर आत्मचिंतन...
सच्चा उद्धार कहाँ से आता है? केवल परमेश्वर से। उद्धार परमेश्वर में उसकी पवित्रता और सामर्थ्य के प्रति गहरे आदरपूर्ण भय के द्वारा, उसके साथ वाचा के सम्बन्ध में विश्वासयोग्यता से जीवन व्यतीत करने के द्वारा, तथा अपनी दृष्टि और निर्भरता उसी पर बनाए रखने के द्वारा प्राप्त होता है। उद्धार के अन्य सभी मार्ग झूठे संक्षिप्त मार्ग हैं जो अंततः स्वयं को एक फंदा सिद्ध करते हैं। उस नट के समान जिसकी दृष्टि भूमि अथवा आस-पास के वातावरण पर नहीं, वरन् अपने सामने की उस रस्सी पर होती है जिस पर उसे चलना है, वैसे ही हमारी दृष्टि भी प्रभु पर होनी चाहिए। केवल उसी की ओर ताकने से ही वह हमें सुरक्षा की ओर ले जाएगा और उस जन के फंदों से बचाएगा जो हमें अपने वश में करने और नष्ट करने की लालसा रखता है। हमारी आँखें निरन्तर प्रभु की ओर लगी रहनी चाहिए क्योंकि हमें विश्वास है कि वह हमें "परीक्षा" से दूर रखेगा और "दुष्ट से बचाएगा" (मत्ती 6:13)।
मेरी प्रार्थना...
बहुमूल्य पिता, आपने मेरा उद्धार करने के लिए बहुत कुछ किया है। आप, जो इतने पवित्र और धर्मी हैं, जब मैं एक पापी था और आपके प्रेम के विरुद्ध बलवे में था, तब आपने नीचे झुककर मेरा हाथ थाम लिया (रोमियों 5:8-11)। आपने अपने अनुग्रह से मेरा उद्धार किया। अब, कृपया मुझे अपने मार्ग सिखाइए। कृपया मेरे जीवन की बुराइयों को सुधारिए। कृपया मुझे अपने सत्य के मार्गों में निर्देशित कीजिए। मैं न केवल अपने विगत पापों से, वरन् व्यर्थता, असारता और निराशा के दिनों से भी उद्धार पाना चाहता हूँ। इसलिए मैं स्वयं को एक पात्र के रूप में आपको अर्पित करता हूँ ताकि आपका आदर करने के लिए मेरा उपयोग किया जा सके। यीशु के नाम में, मैं प्रार्थना करता हूँ। आमीन।


