आज के वचन पर आत्मचिंतन...

वह दुष्ट, अर्थात् शैतान, कोई काल्पनिक प्राणी या बनावटी शक्ति नहीं है जिसे हम बचकाना भय समझकर नकार दें। वह और उसकी सामर्थ्य वास्तविक हैं, और उसका उद्देश्य हमें अनन्त हानि पहुँचाना है! (मरकुस 5:1-20 में उस दुर्दशाग्रस्त मनुष्य को देखिए जो दुष्टात्माओं की एक सेना से ग्रसित था, और देखिए कि वह दुष्ट हम सब के साथ क्या करना चाहेगा।) तथापि, उसके विषय में चिन्ता करने में अपना समय व्यतीत करने के स्थान पर, आइए जब हम परीक्षा में पड़ें तो उसका सामना करें और यीशु पर अपना ध्यान केन्द्रित करें। यीशु ने क्रूस पर उस दुष्ट और उसकी दुष्टात्माओं की सेना को पराजित किया (कुलुस्सियों 2:15)। यीशु ने कलवरी के उस महा-संग्राम में विजय प्राप्त की, और शैतान पर जयवन्त हुए। उसने उस दुष्ट के सबसे बड़े अस्त्र, मृत्यु, और हमारे मृत्यु के भय को ले लिया और उसे निष्प्रभाव कर दिया (इब्रानियों 2:14-15)। अब हम उसका सामना कर सकते हैं, और हमारे भीतर तथा हमारे पक्ष में उपस्थित यीशु के कारण शैतान भाग जाएगा (याकूब 4:7)।

मेरी प्रार्थना...

सर्वशक्तिमान परमेश्वर, हम पर और हमारे संसार पर से उस दुष्ट के फंदे को तोड़ने के लिए यीशु को भेजने के हेतु तेरा धन्यवाद हो। उद्धारकर्ता की मृत्यु के द्वारा, तूने हमें यह निश्चय दिलाया है कि हमारी मृत्यु हमारे सम्बन्ध का अन्त नहीं, वरन् सदा के लिए तेरे साथ हमारे जीवन का आरम्भ होगी। आज, मैं यह विनती करता हूँ कि तू विशेष रूप से मेरे जीवन पर उस दुष्ट की सामर्थ्य और प्रभाव का सामना करने में मेरी सहायता कर। यीशु के सामर्थी नाम में पाई जाने वाली सामर्थ्य के द्वारा, मैं प्रार्थना करता हूँ। आमीन।

आज का वचन का आत्मचिंतन और प्रार्थना फिल वैर द्वारा लिखित है। help@verseoftheday.com पर आप अपने प्रशन और टिपानिया ईमेल द्वारा भेज सकते है।

टिप्पणियाँ