आज के वचन पर आत्मचिंतन...
जब परिस्थितियां कठिन होती हैं, तो मैं परमेश्वर को पुकारता हूँ और उसकी दया और अनुग्रह पर निर्भर रहता हूँ। परंतु अपने हृदय की गहराई में मुझे भय रहता है कि कहीं मैंने उसे केवल संकट के समय काम आने वाला उद्धारकर्ता तो नहीं बना लिया — वह जिसके पास मैं केवल विपत्ति के दिनों में ही जाता हूँ। जब मैं अपनी आशीषों में आनंदित होता हूँ और सब कुछ ठीक चल रहा होता है, तब मैं बहुधा इस्राएलियों के समान हो जाता हूँ। मैं यह स्वीकार करना भूल जाता हूँ कि मेरी समस्त आशीषें और अवसर परमेश्वर के अनुग्रह के कारण ही मिले हैं। अपने आनंद और सफलता में, मुझे उसे स्वीकार करना सीखना होगा और अपनी स्वयं की बुद्धि और सामर्थ्य पर भरोसा नहीं करना होगा। नीतिवचन की बुद्धि मुझे चुनौती देती है कि मैं परमेश्वर का आदर करूँ और "अपने सारे चालचलन में" उसे स्वीकार करूँ, न कि केवल कठिन समय में उसे पुकारूँ। मुझे भले और बुरे दोनों समयों में, सहज और चुनौतीपूर्ण दोनों परिस्थितियों में परमेश्वर पर भरोसा रखना होगा और उसके प्रति अपनी आवश्यकता को स्वीकार करना होगा। मैं आपको भी अपने साथ परमेश्वर पर भरोसा रखने और "अपने सारे चालचलन में" उसे स्वीकार करने के समर्पण में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित करता हूँ।
मेरी प्रार्थना...
अनुग्रहकारी पिता, मेरे जीवन में जो भी भली वस्तु है, वह आपकी ही ओर से आई है। वह परिवार जिससे मैं आशीषित हुआ हूँ, वह सुरक्षा जो मुझे मिली है, वे मूल्य जिन्हें मैं थामे हुए हूँ, वे सफलताएं जिनका मैंने आनंद लिया है, वह आशा जो मुझे प्राप्त है, वह उद्धार जो मुझे मिला है, और वह भविष्य जिसकी मैं बाट जोहता हूँ—ये सब केवल आपके अनुग्रह के कारण ही मेरे हैं, मेरी अपनी भलाई या बुद्धि के कारण नहीं। मुझे आपकी आवश्यकता है, मैं आप पर भरोसा रखता हूँ, और मैं अपने सारे चालचलन में आपको अपने परमेश्वर के रूप में स्वीकार करता हूँ। यीशु के नाम में, मैं मेरा प्रभु होने के लिए आपका धन्यवाद करता हूँ। आमीन।


