आज के वचन पर आत्मचिंतन...
पौलुस इस बात पर बल देते हैं कि धन्यवाद से भरे हुए हृदय उत्तम गायन उत्पन्न करते हैं! यीशु के हमारे उद्धार का स्रोत और हमारे भविष्य का केन्द्र होने के कारण, हम भला कैसे न गाएँ? परन्तु गायन केवल परमेश्वर की स्तुति करने के लिए ही नहीं है। परमेश्वर चाहते हैं कि हमारे गीत दूसरों को आशीष दें, दूसरों से बातें करें, और प्रभु यीशु मसीह में पाई जाने वाली हमारी आशा में दूसरों की उन्नति करें। इसका अर्थ यह है कि गायन हमारा परम आत्मिक सम्भाषण है। यह परमेश्वर को धन्य कहता है और दूसरों को आशीष देता है! इसलिए, आइए हम अपने गीतों और गायन के द्वारा स्तुति में परमेश्वर से बातें करें। और आइए हम उन्हीं गीतों और गायन के द्वारा आपस में भी बातें करें, ताकि हम सब मिलकर सर्वकालिक सन्तों के साथ एकत्र होने, और उसके अनुग्रह के सिंहासन के सम्मुख एक-दूसरे को तथा परमेश्वर को धन्य कहने की प्रत्याशा कर सकें।
मेरी प्रार्थना...
हे प्रभु मेरे परमेश्वर, आप भययोग्य और अद्भुत हैं। आपके कार्य वैभवशाली हैं, और आपके कर्म समझ से परे हैं। मेरे मुख के वचन और मेरे हृदय के विचार सर्वदा आपकी स्तुति का प्रचार करें। मेरा हृदय उस सब के प्रति धन्यवाद से भर जाए जो आपने मुझे पाप, लज्जा, व्यवस्था और मृत्यु से बचाने के लिए किया है। केवल आप ही मेरी स्तुति, मेरे गीतों और मेरे जीवन के योग्य हैं। अतः कृपया मेरे स्तुति के गीतों को ग्रहण करें और मसीह में मेरे भाइयों और बहनों को आशीष देने तथा उन्हें आपके लिए जीने को प्रोत्साहित करने के लिए उनका उपयोग करें। यीशु के पवित्र नाम में, मैं प्रार्थना करता हूँ। आमीन।


