आज के वचन पर आत्मचिंतन...

यद्यपि हमारे चारों ओर का संसार हमें सब प्रकार के सन्देश सुनाने के लिए पुकारता है, तौभी हम यह चुनने का अधिकार रखते हैं कि हम अपने मनों को किस स्रोत की जानकारी से पोषित करें। यह विशेषाधिकार और स्वतंत्रता उस उत्तरदायित्व के साथ भी आती है कि हम क्या सुनते हैं और किसकी आज्ञा का पालन करते हैं। यीशु के अनुयायियों के रूप में, परमेश्वर के सत्य को सुनना केवल एक चुनाव ही नहीं, वरन एक पवित्र प्रतिबद्धता है। परमेश्वर पवित्र शास्त्र में प्रकट की गई अपनी इच्छा के द्वारा, और अपनी व्यवस्था में जो कुछ पवित्र और ग्रहणयोग्य है उसके अपने नैतिक मार्गदर्शन और परिभाषाओं के द्वारा हमें आशीष देने की अभिलाषा रखता है। तौभी, वह आशीष तब तक सुप्त रहती है जब तक कि हमारे हृदय उसकी इच्छा को जानने और उसे पूरा करने में आनन्दित नहीं होते। जैसे पुत्र और हमारे उद्धारकर्ता, यीशु ने पृथ्वी पर अपने सम्पूर्ण जीवन में किया, वैसे ही आइए हम भी परमेश्वर की इच्छा को जानने और उसे पूरा करने में अपना आनन्द ढूंढें!

मेरी प्रार्थना...

हे अद्भुत सृष्टिकर्ता, जिस प्रकार तूने ऐसे सुंदर संसार की रचना की और मेरी माता के गर्भ में मुझे कोमलता से गढ़ा, वैसे ही मैं तुझ से यह भी विनती करता हूँ कि तू मेरे भीतर तेरे सत्य को जानने की अभिलाषा उत्पन्न कर और उस सत्य के अनुसार जीवन जीने की इच्छा शक्ति प्रदान कर। मैं जानता हूँ कि इस यात्रा में मुझे सामर्थ्य देने और मुझे रूपांतरित करने के लिए तेरी पवित्र आत्मा मुझ में वास करती है। तूने जिन सब रीतियों से मुझे आशीष दी है, उनके निमित्त मैं तुझे प्रसन्न करने और तेरी स्तुति करने के लिए लालायित हूँ। मैं तेरे सत्य में मगन रहने का चुनाव करता हूँ! यीशु के नाम से, मैं प्रार्थना करता हूँ। आमीन।

आज का वचन का आत्मचिंतन और प्रार्थना फिल वैर द्वारा लिखित है। help@verseoftheday.com पर आप अपने प्रशन और टिपानिया ईमेल द्वारा भेज सकते है।

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